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मंगलवार, 27 फ़रवरी 2024

ग़ज़ल - ' जीवनभर अभिलाषा रखना '

 जीवनभर अभिलाषा रखना


जीवनभर अभिलाषा रखना,

यानी खूब निराशा रखना।


हँसना रोना चांँद की खातिर,

तुम भी यही तमाशा रखना।


प्रेम गीत के हर पन्‍ने पर,

खूब विरह की भाषा रखना।


जिसकी तुमसे प्‍यासा बनी हो,

उसको बेहद प्‍यासा रखना।


मैंने सबकुछ छोड़ दिया है,

मुझसे अब न आशा रखना।


✏ प्रियांशु 'प्रिय' 

गीत - ' मैं तुम्‍हारा मीत बनना चाहता था '

                        गीत  


मैं तुम्‍हारा मीत बनना चाहता था,

पर तुम्‍हारे प्‍यार ने सब मार डाला ।

 

शब्‍द मेरे थे तुम्‍हारे और कुछ भी शेष न था,

नेह की बगिया हरी थी, तब कहीं भी द्वेष न था।

था हमारे और तुम्‍हारे बीच इक संबंध ऐसा,

क्‍यारियों में रातरानी की महकती गंध जैसा।

मैं कहीं भी रोशनी बन‍कर चमकता,

पर किसी अंधियार ने सब मार डाला।

मैं तुम्‍हारा मीत बनना....................

 

स्‍वप्‍न के टूटे हुए हिस्‍से के जैसा हो गया हूँ,

भूलकर मैं अनकहे किस्‍से के जैसा हो गया हूँ।

भूलना कितना कठिन है, जानकर यह ज्ञात होगा,

भूल जाओगे स्‍वयं को, तब बहुत आघात होगा।

गंतव्‍य तक चलने का हम सपना लिए थे,

प्रारंभ के ही द्वार ने सब मार डाला।

मैं तुम्‍हारा मीत बनना.................


✒ प्रियांशु 'प्रिय'

   सतना ( म. प्र. )

सोमवार, 26 फ़रवरी 2024

कविता - ' बढ़ बटोही '

कविता 

' बढ़  बटोही '


लक्ष्‍य के सोपान पर तू चढ़ बटाेही,

बढ़ बटोही ।।


व्‍योम को जा चूम ले,

जग ये सारा घूम ले।

कर दे विस्‍मृत हर व्‍यथा को,

मग्‍न होकर झूम ले।

जा वि‍पिन में रास्‍तों को,

तू स्‍वयं ही गढ़ बटोही। 

बढ़ बटोही........


गिरि‍ नहीं है न्‍यून है,

है कि जैसे शून्‍य हैै।

कष्‍ट हैै भयभीत जिससे,

हाँँ वो तेरा खून है। 

और लिख - लिख गीत पथ के,

खूब उनको पढ़ बटोही। 

बढ़ बटोही.........


✒ प्रियांशु ' प्रिय '

      सतना ( म. प्र. ) 




       

हिंदी रचना - '' जाने कितने धंधे होते ''

     जाने कितने धंधे होते 


जाने कितने धंधे होते,

            कुछ अच्‍छे, कुछ गंदे होते। 

जिन‍की भूख ग़रीब का खाना,

            वो सारे भिखमंगे होते। 

झूठ को देखे और न बोलें,

            जो गूँगे और अंंधे होते। 

बुरा भला न बोलो उनको,

            जिनके गले में फंदे होते। 

ये जो शेर बने फिरते हैं,

            दो कौड़ी के बंदे होते। 


✒ प्रियांशु कुशवाहा  

        सतना ( म प्र )

बघेली कविता - ' हुसियारी नहीं आबय '

              बघेली कविता - 


जउने दिना घर मा महतारी नहीं आबय,

जानि ल्‍या दुअरा मा ऊजियारी नहीं आबय । 


जउन खइथे अपने पसीना के खइथे,

हमरे इहाँँ रासन सरकारी नहीं आबय । 


ठाढ़ के मोगरा टेड़ कइके देखा , 

बेसहूरन के माथे हुसियारी नहीं आबय । 

 

कब्‍जाय लिहि‍न उँईं सगली जाघा जमींन,

अब अर्जी लगाए मा पटवारी नहीं आबय । 


द्रौपदी के धोतिया के खीचै दुसासन,

कलजुग मा कउनव गिरधारी नहीं आबय ।  


- प्रियांशु कुशवाहा 'प्रि‍य' 

मोबा; 9981153574                                               

रविवार, 25 फ़रवरी 2024

कविता - ' आते न गिरधारी हैं '

   ' आते न गिरधारी हैं '

रचनाकार - प्रियांशु कुशवाहा 'प्रिय'

भीख में माँगो न्याय मिलेगा, हक में हिस्सेदारी है।
ढेरों फर्जी काम देश में, कहलाते सरकारी हैं।


देश की पीड़ाओं की खबरें, भला कहां अब आती हैं,
अखबारों में छपता है कि,चीन ने मक्खी मारी है़।

जिन नागों की देश में पूजा, भगवन जैसे होती है,
ख़बर नहीं है किसी को लेकिन, ये सारे विषधारी हैं।

खींच रहा है चीर दुःशासन, डरी द्रौपदी बुला रही,
अब कलयुग में शांत हो गए, आते न गिरधारी हैं।

जिनकी रक्षा और सुरक्षा, की बातें बस होती हैं,
आँसू के संग घुट-घुट जीती, वे भारत की नारी हैं।

सदियों से सब झेल रहे हैं, सरकारी आघातों को।
परिवर्तन तो नहीं है कुछ भी, वही प्रक्रिया जारी है।

जब भी हम मतदान किए तो,एक बात ये जान गए।
कुर्सी वाले जीते हैं और, देश की जनता हारी है।


- प्रियांशु कुशवाहा 
 मोबा. 9981153574

किसान पर कविता -

क‍विता -  

                  देश का किसान  

अंधियारों को चीर रोशनी को जिसने दिखलाया है।
और स्वयं घर पर अपने वह लिए अंधेरा आया है।
जिसके होने से धरती का मन पावन हो जाता है।
जिसके छूने से खेतों का तन उपवन हो जाता है।
मात देता है निरंतर वह देह की थकान को...
शत् शत् नमन मेरा इस देश के किसान को...

आँधियाँ तूफान जिनके तेज से भयभीत होते।
पग में छाले, हाथ काले, जख़्म के ये मीत होते।
जो धूप इस तन को छुए, वह स्वयं सौभाग्य पाती।
और पसीने की चुअन हर खेत को पावन बनाती।
खूब उर्वर वह बनाता बंज़र पड़े मैदान को...
शत् शत् नमन मेरा इस देश के किसान को...

हजारों योजनाएँ आज भी पन्नों में अटकी हैं।
बहुत मजबूरियाँ इनकी वो फांसी पे लटकी हैं।
न जाने कब मिलेगा न्याय हमारे इस विधाता को।
परिश्रम के कठिन स्वामी विश्व के अन्नदाता को।
अनमोल है हीरा मिला, हिन्दोस्तान को...
शत् शत् नमन मेरा इस देश के किसान को...

© प्रियांशु कुशवाहा "प्रिय"
         सतना ( म. प्र. )
    मो. 9981153574





बघेली ग़ज़ल - दतनिपोर है कक्‍का ।। Bagheli Ghazal - Datnipor hai Kakka

   बघेली ग़ज़ल  दतनिपोर है कक्‍का लड़िका खासा गोर है कक्का। लेकिन  दतनिपोर  है कक्का। नेताजी अब उचयं न घर से, का उनखे बरतोर है कक्का ? गरीब ...