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रविवार, 25 फ़रवरी 2024

कविता - ' आते न गिरधारी हैं '

   ' आते न गिरधारी हैं '

रचनाकार - प्रियांशु कुशवाहा 'प्रिय'

भीख में माँगो न्याय मिलेगा, हक में हिस्सेदारी है।
ढेरों फर्जी काम देश में, कहलाते सरकारी हैं।


देश की पीड़ाओं की खबरें, भला कहां अब आती हैं,
अखबारों में छपता है कि,चीन ने मक्खी मारी है़।

जिन नागों की देश में पूजा, भगवन जैसे होती है,
ख़बर नहीं है किसी को लेकिन, ये सारे विषधारी हैं।

खींच रहा है चीर दुःशासन, डरी द्रौपदी बुला रही,
अब कलयुग में शांत हो गए, आते न गिरधारी हैं।

जिनकी रक्षा और सुरक्षा, की बातें बस होती हैं,
आँसू के संग घुट-घुट जीती, वे भारत की नारी हैं।

सदियों से सब झेल रहे हैं, सरकारी आघातों को।
परिवर्तन तो नहीं है कुछ भी, वही प्रक्रिया जारी है।

जब भी हम मतदान किए तो,एक बात ये जान गए।
कुर्सी वाले जीते हैं और, देश की जनता हारी है।


- प्रियांशु कुशवाहा 
 मोबा. 9981153574

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