बघेली ग़ज़ल
दतनिपोर है कक्का
लड़िका खासा गोर है कक्का।
लेकिन दतनिपोर है कक्का।
नेताजी अब उचयं न घर से,
का उनखे बरतोर है कक्का ?
गरीब के बिटिया पढ़ैं लाग ही,
गॉंव भरे मा सोर है कक्का।
तुम्हरे घर मा घुप्प मचा है,
उनखे खूब अंजोर है कक्का।
बोट दिहा तुम आसवं जेखा,
पता चला व चोर है कक्का। - कवि प्रियांशु प्रिय सतना ( मध्यप्रदेश )

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