-->

मंगलवार, 14 अक्टूबर 2025

बघेली कविता संग्रह 'गाँव गोहार' की समीक्षा

 गाँँव गोहार : एक सापेक्ष आकलन 

                                             - गीतकार सुमेर सिंह शैलेश 

बघेली के लोकप्रिय कवि सूर्यभान कुशवाहा की उन्‍तीस बघेली रचनाओं का सद्य: प्रकाशित कविता संग्रह ‘गाँव गोहार’  शीर्षक से एकता सृजन कुटीर से प्रकाशित हुआ है। बघेली में ‘गोहार’ शब्‍द अपनी कातर आवाज़ को दूर दूर तक पहुँचाने के लिए प्रयुक्‍त होता है। किसी विशेष संकट के समय ही गोहार लगाई जाती है। आज देश और समाज में सबकुछ सुन जानकर भी अनसुना कर देने का प्रचलन दिखाई पड़ता है। ऐसी विकट परिस्‍थ‍ित‍ि में ही कुछ विसंगतियों और यथार्थ की अभिव्‍यक्‍ति देने के लिए कवि गाँव की पीड़ा को वाणी देता है। भारत गाँवों को देश है। कवि अपने कथन में स्‍पष्‍ट करता है कि – ‘आजौ बहुतेरे गाँव गमइन मा गांधी बाबा के ग्राम स्‍वराज वाला सपना सच होत देखाई नहीं परै....मेर मेर के समस्‍यन से गाँव जूझि रहा है। चाहे घर दुआर पानी पिंगल के व्‍यवस्‍था होय या फेर गिरहस्‍थी के भरमजाल के।‘’ इसी केंद्रीय भावना के अनुरूप विभिन्‍न शीर्षकों से कविताएँ लिखी गई हैं। सभी का अभिप्रेत और संप्रेषण अपना अपना है।

    महाकवि तुलसी, वाल्‍मीक और भवभूति से अलग हटकर रामकाव्‍य का सृजन करते हैं। जनबोली या जन भाषा अवधी में इस काव्‍य का संप्रेषण अपढ़ और निरक्षर जन जन तक अधिक व्‍यापक रूप से हुआ है। संप्रेषण में अपनी बोली भाषा का कोई शानी नहीं। पूर्वी‍ हिंदी की बोलियों में अवधी की सगी बहन बघेली है, जो क्रियापदों की भ‍िन्‍नता के साथ एक जैसी ही है। बघेलखंण्‍ड के सोंधी माटी की महक और मिठास बघेली के शब्‍द शब्‍द में अनुभव की जा सकती है। कवि सूर्यभान ने बघेली के ठेठ देशज और ग्राम्‍यज शब्‍दों का प्रयोग अपनी कविताओं में किया है। कवि ने गाँव के यथार्थ को भोगा है उसे ओढ़ा नहीं है, इसीलिए कविताओं से तल्‍ख सच्‍चाइयाँ झाँकती दिखाई पड़ती हैं।

 

- प्रो. सुमेर सिंह शैलेश 
      (सुप्रसि‍द्ध कवि‍/गीतकार)


बघेली कव‍िता संग्रह 'गाँँव गोहार' पढ़ने के लिए नीचे दी हुई लिंक के माध्‍यम से आज ही खरीदें।  
LINK 👉 GAON GOHAR | A Collection of Bagheli Poems 

शुक्रवार, 19 सितंबर 2025

साह‍ित्‍य अकादमी भोपाल- युवा रचनाधर्मा कुंभ 2025

साह‍ित्‍य अकादमी भोपाल- युवा रचनाधर्मी कुंभ 2025 

दिनांक 15 सितंबर 2025 को मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी, भोपाल और संस्कृति विभाग के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित 'भारतीय मातृभाषा अनुष्ठान' में शामिल होने का सुअवसर प्राप्त हुआ। 



 
युवा शायर कुनाल बरकड़े 








सोमवार, 4 अगस्त 2025

कविता- जीवन रोज़ बिताते जाओ

      जीवन रोज़ बिताते जाओ 

                                                                             

भूख लगे तो सहना सीखो,

सच को झूठा कहना सीखो।

दर्द उठे तो कुछ मत बोलो,

पीड़ाओं संग रहना सीखो।

जिनके  पॉंव  दबी हो गर्दन,

बस उनके गुण गाते जाओ....

जीवन रोज़ बिताते जाओ....


पढ़ना लिखना ठीक  नहीं  है।

मिलती भी कुछ सीख नहीं है।

चोरी   और   डकैती अच्छी,

कम से कम ये भीख नहीं है।

सदा  सुरक्षित  रहोगे  साथी,

उनके  पॉंव  दबाते  जाओ...

जीवन रोज़ बिताते जाओ...


नेताओं   के  तलवे  चाटो।

ज़हर मिलाकर पानी बाटो।

जो अपनी  आवाज़ उठाएँ,

पहले उनकी  गर्दन  काटो।

सीधे  सादे  लोगों को तुम,

ऐसे  ही  लतियाते  जाओ...

जीवन रोज़ बिताते जाओ...


बेमतलब  की  भाषा बोलो,

गली  गली  तलवारें  खोलो,

बहे जिधर नफ़रत की ऑंधी,

तुम भी उसी दिशा में हो लो,

नेकी करके  क्या कर‌ लोगे ?

लूट  लूट  कर  खाते जाओ...

जीवन  रोज़  बिताते जाओ....


- कवि प्रि‍यांशु 'प्रिय' सतना ( मध्‍यप्रदेश )

शनिवार, 19 जुलाई 2025

तमिल ग्रंथ 'तिरुक्कुरल' का बघेली अनुवाद

                     🪷 तमिल ग्रंथ तिरुक्कुरल और बघेली का संगम 🪷

केंद्रीय शास्‍त्रीय तमिल संस्‍थान के द्वार पर....

देशभर से आए विभ‍िन्‍न भाषाओं के विद्वान



समापन समारोह में वक्‍तव्‍य देते हुए कवि प्रियांशु 

समापन समारोह में वक्‍तव्‍य देते हुए कवि प्रियांशु साथ ही मंचासीन अतिथि‍ 


समापन समारोह में वक्‍तव्‍य देते हुए कवि प्रियांशु







9 से 15 जुलाई 2025 तक चेन्नई स्थित केंद्रीय शास्त्रीय तमिल संस्थान (CICT) में प्रसिद्ध तमिल ग्रंथ ‘तिरुक्कुरल’ की विभिन्न भारतीय भाषाओं में अनुवाद समीक्षा हेतु एक विशेष कार्यशाला आयोजित हुई। सौभाग्य की बात है कि मुझे बघेली भाषा के प्रतिनिधि के रूप में आमंत्रित किया गया। पूरे भारत से आए विद्वानों के साथ मिलकर इस ऐतिहासिक ग्रंथ की गहराई को समझना और अपनी भाषा में उसका मूल्यांकन करना एक अविस्मरणीय अनुभव रहा। इस अवसर पर मैं संस्थान के निदेशक प्रो. के. चंद्रशेखरन सर, रजिस्ट्रार डॉ. आर. भुवनेश्वरी मैम, मद्रास विश्वविद्यालय की हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. सरस्वती मैंम, प्रो. गोपालकृष्णन सर तथा आयोजन समन्वयक डॉ. अलगुमुत्थु वी. सर का हृदय से आभार प्रकट करता हूँ। जिन्होंने इस ग्रंथ को विभिन्न भाषाओं के साथ जोड़ने हेतु विचार किया। 

गर्व है कि उत्तर भारत की भाषाएं अब धीरे-धीरे दक्षिण भारत में भी सुनी और समझी जा रही हैं। बघेली के माध्यम से 'तिरुक्कुरल' से जुड़ना मेरे लिए केवल एक दायित्व नहीं बल्कि आत्मिक सुख का अनुभव रहा।‌ शीघ्र ही 'तिरुक्कुरल' का बघेली अनुवादित संस्करण प्रकाशित होगा।

CICT की पूरी टीम का हृदय से धन्यवाद। ❤️


Central Institute of Classical Tamil 

#Tirukkural #Bagheli #CICT #TranslationReview #Chennai #IndianLanguages #thiruvalluvar #tamilnadu

बघेली कविता - कक्‍कू के परधानी मा

कक्कू के परधानी मा

खासा दच्चा लागत है अउ कादव होइगा पानी मा
रोड नहीं बन पाई असमौं , कक्कू के परधानी मा।

कादव कीचर मा रेंग रेंग, लड़िका बच्चा स्कूल जायं।

गामन के यहै समस्या का, नेताजी रोजै भूल जायं।

गाड़ी वाहन से निकरय वाला, अंतरे दुसरे गोड्डाय रहा।

घिनहे रस्ता अउ हीला मा, पहिरे ओन्हा लेथराय रहा। 

आवेदन उनखे लघे जाय त, गारी बरसय बानी मा।

रोड नहीं बन पाई असमौं, कक्कू के परधानी मा।


जब चुनाव के बेरा आबय, घर घर माहीं आबत हें।

बीस मेर के वादा कइके, वोट ईं सबसे मागत हें।।

जीत गें जबसे अपने काहीं, देउता मानय लागे हें।

इनहिंन के वोटर अब इनहीं, घिनहे लागय लागे हें।

तनै लिहिन दस मंजिल आपन, जनता रहिगै छान्ही मा।

रोड नहीं बन पाई असमौं, कक्कू के परधानी मा। 


सीधी सतना रीमां सबतर, गांव गांव या हाल रहै।

सुनय नहीं कोउ इनखर, जनता रोबय बेहाल रहै।।

सुरुक लिहिन सरकारी पइसा, सोमय टांग पसारे।,

भोग रही ही भोगय जनता, धइके हाथ कपारे।

कवि प्रियांशु लिखत हें कविता, बाचैं रोज कहानी मा।

रोड नहीं बन पाई असमौं, कक्कू के परधानी मा। 


- कवि प्रियांशु 'प्रिय'
( 19 जुलाई 25 )






शनिवार, 7 जून 2025

गीत- हम बस यहाँ कुँवारे बैठे

 

हम बस यहाँ कुंवारे बैठे  



जीवन की  आपाधापी में, कुछ जीते कुछ हारे बैठे।
सब यारों की शादी‌ हो गई, हम बस यहाँ कुँवारे बैठे.......

साथ साथ सब पढ़े लिखे पर, न जाने कब बड़े हो गए।
पता नहीं ये लगा कि कब हम, अपने पैरों खड़े हो गए।
सबने छोड़ा गाँव और अब, देश विदेश में रहते हैं।
डॉक्टर और इंजीनियर हैं, ये अंग्रेजी में कहते हैं।
मोहन भाई दिल्ली में है, उसका अपना परिवार है।
दो छोटे बच्चे हैं उसके, पत्नी भी खूब होशियार है। 
व्हाट्सएप डी पी में देखा, बच्चे प्यारे प्यारे बैठे....
सब यारों की शादी‌ हो गई, हम बस यहाँ कुँवारे बैठे......

बात नहीं होती उससे पर, फेसबुक से ज्ञात हुआ‌ है।
राहुल भी हो गया वि‍वाह‍ि‍त, ब्‍याह उमा के साथ हुआ है।
बैंक मैनेजर है वह उसकी बीवी भी अधिकारी है।
रहते हैं भोपाल में दोनों, दो नौकर हैं एक गाड़ी है।
सूरज, माधव, कृष्‍णा, सोनू, सबने घर को छोड़ दिया है।  
वे सब शहर में रहते हैं और गाँव से नाता तोड़ दिया है।
राह देखते बेटवा की अब, पापा साँझ सकारे बैठे.....  
सब यारों की शादी‌ हो गई, हम बस यहाँ कुँवारे बैठे...... 



लेखन - 8 जून 2025                            - कव‍ि प्रियांशु 'प्रिय' 


  
 

 

 

 

  

 

गुरुवार, 5 जून 2025

कविता - विचारधारा

 


जैसे‌ दीमक लकड़ी को खाता है 

ठीक उसी तरह,

धीरे धीरे खाती जा रही है

विचारधारा

मनुष्य के मस्तिष्क को..


रोज़ अनेक संस्थाएं बनती जा रही हैं।

विचारधारा को अपनाकर..


कोई गरीब की बात करता है

कोई दबे कुचलों की बात करता है

तो इंकार कर देती है एक विचारधारा इसे अपनाने से 


कोई अमीरों की बात करता है

कोई पूंजीपतियों की बात करता है

तो इंकार कर देती है दूसरी विचारधारा इसे अपनाने से


शामिल होना चाहता हूं,

एक ऐसी विचारधारा में,

जो करें मनुष्य की बात और निर्माण करे मानवता का..


- प्रियांशु 'प्रिय'

गुरुवार, 15 मई 2025

बेटी की विदाई पर बघेली कव‍िता

 बेटी की विदाई पर बघेली कव‍िता  


अम्मा रोमयं , बहिनी रोमयं, रोमयं सगले भाई‌‌,

बाबौ काहीं खूब रोबाइस, बिटिया केर बिदाई।

बिटिया केही भए मा बाबा, खूब उरांव मनाइन ते,

अपने अपने कइती सबजन, कनिया मा छुपकाइन ते।

चारिउ कइती जंका मंका, खूबय खर्चा कीन्हिंन तै,

यहै खुशी के खातिर बाबा, सबतर नेउता दीन्हिन तै।

कइ दिन्हिंन अब काज हो दादा, होइगै वहौ पराई।

बाबौ काहीं खूब रोबाइस, बिटिया केर बिदाई.......

घर के बहिनी बिटिया आईं, मेंहदी लागय लाग,

सुध कइ कइ के काजे केहीं, ऑंसू आमय लाग। 

आस पड़ोस के सबै मेहेरिया, घर मा आमय लागीं,

सबजन साथै बइठिके देखी, अंजुरी गामय लागीं।

रहि रहि ऑंसू बहय आज हम, कइसन केर छिपाई,

बाबा काहीं खूब रोबाइस, बिटिया केर बिदाई.......

फूफू काकी मउसी बहिनी, ऑंसू खूब बहामय,

बाबा रोमय सिसक सिसक के, बेटी का छुपकामय।

बिदा के दरकी बिटिया काहीं , अम्मा गले लगाए,

रोए न लाला बोलि बोलिके, ऑंसू रहै बहाए।

सीढ़ी‌ के कोनमा मा बइठे, रोमय सगले भाई,

बाबा काहीं खूब रोबाइस, बिटिया केर बिदाई....... - कवि प्रि‍यांशु 'प्र‍िय' मो. 9981153574

ऑपरेशन सिंदूर

ऑपरेशन सिंदूर
भारत बदला लइ लीन्‍हि‍स अ, हउकिस खासा तान के, 
निकहा अइसी तइसी होइगै, घिनहे पाकिस्‍तान के।
घर दुआर सब निपुर गें खासा,  होइगै ही बरबादी।
आधी रात के हमला माहीं, जब मरे हें आतंकवादी।  
पहलगाम मा तै मारे तै, चीन्‍ह चीन्‍ह जब मनई।
होत ही कइसा पीरा सारे, या तोखा अब जनई।
दुलहिन के स‍िंदूर उजारे, महतारि‍न केर लोलार।
बह‍िनिन के भाई का मारे, बेटबन केहीं प्‍यार।
मनई नहीं सनीचर आहे, बिन लात खाए न मनते है। 
भारत के ताकत तै खासा, निकहे सेहीं जनते है।
जब पिठांय सुहुराय तोर तब, भारत कइ नि‍हारे।
कचर गए तै कइयक दरकी, सुध कइ लीन्‍हें सारे।
ऑपरेशन सिंदूर न ब‍ि‍सरी, बिसरी न य बदला।
अइसय जो करतूत रही त,पाक य निपुरी सगला।
काश्‍मीर भारत के है या रोज सकन्‍ने बाँचा कर। 
दोख द‍िहे तै बाद मा पहिले, आपन काँपी जाँचा कर।
भारत के सेना दुश्‍मन काहीं, हेर हेर के मारत ही।
कहौं लुका होय दुनियाँ मा, गोड़े के नीचे गाड़त ही।     
सौ सौ बेर प्रणाम करिथे, हे भारत केर जवान। 
होए से तुम्‍हरे अमर हबय या, आपन हिंदुस्‍तान। -कवि प्रियांशु 'प्र‍िय' मोबा. 9981153574

शनिवार, 3 मई 2025

‘सैफू के बघेली गीत’ कृति की भूमिका

 

‘सैफू के बघेली गीत’ कृति की भूमिका जो कि अवधेश प्रताप सिंह विश्वविद्यालय में हिंदी विभाग के अध्यक्ष रहे डा. भगवती प्रसाद शुक्ल जी द्वारा 1982 में लिखी गई थी।

'आंचलिक बोलियों में साहित्य सृजन का काम रचना धर्मिता का सुविधा प्रद रूप नहीं है। क्योंकि बोलियों के साहित्य की एक सीमा होती है, उसका राष्ट्रव्यापी प्रचार प्रसार नहीं हो पाता – इसलिए महत्वाकांक्षी साहित्यकार कभी भी आंचलिक बोलियों में सृजन नहीं करते, क्योंकि वे जानते हैं कि साहित्य के इतिहास में उनका नाम इस आधार पर नहीं रेखांकित हो सकता -- इसलिए जो भी साहित्यकार आंचलिक साहित्य के सृजन में लगे हुए हैं। वे तलवार की धार पर चल रहे हैं।
सैफू का मार्ग भी कंटकाकीर्ण है। यह कल्पना करना भी दुरूह लगता है कि वे चालीस वर्षों से नितांत उपेक्षित एक आंचलिक बोली बघेली में साहित्य सृजन कर रहे हैं। यह उनके साहस और साधना का परिचायक है। मैं उन्हें कोई पैंतीस वर्षों से जानता हूँ। वे रोज लिखते हैं। लेखन को धर्म मानकर लिखते हैं। समाज और देश के लिए लिखते हैं। धरती और किसान के लिए लिखते हैं।
‘सैफू’ बघेली के लिए अपरिहार्य हैं। बघेली की इस गागर को उन्होंने भाव के अमृत से भरा है। इसीलिए आज उनकी कविता की कीर्ति कलश उच्चासन पर आसीन है।
‘सैफू’ के बघेली गीत उनकी अद्यतन कृति है। इसमें उनके इकतालीस गीत संग्रहीत हैं। इसमें विषय की विविधता है। कथ्य की विदग्धता है। शिल्प का कौशल है, भाषा जन जन में व्याप्त बघेली है। इसमें आरोपित कुछ भी नहीं, जो कुछ है सहज है, स्वाभाविक है।
बघेली के गीत में, हर मौसम के गीत हैं। फागुन के, सामन के, ग्रीष्म के, सभी में टटकापन है। सरसता है – किसी किसी ऋतु पूरक गीत में मन के मीत का मोहन आमंत्रण है।
‘टपकै मल महुवा अधरतिया,
होइगे हें बलम मोर मनवसिया।
सेजा विछाऊँ सुपेती बिछाऊँ,
सोमैं न आवा बलम रसिया,
टपकै मन महुआ अधरतिया।।‘’
इन गीतों में एक प्रकार की निजता है। जिसे सैफू की निजता कहेंगे। यहाँ की धरती की सुधर मेहेरिया, का रूप कितना जीवंत है –
‘रहै बिदुरात सांझ बइठ डेहेरिया,
कहौं केसे राम मोर सूधर मेहेरिया।‘’
मैंने सैफू के गीत पढ़े भी हैं और सुने भी हैं। इनमें बघेली की आत्मा बोलती है। इनकी धड़कनों में बघेलखंड की पीड़ा, हर्ष, विषाद सभी कुछ सन्िित है।
सैफू से बघेली गीत जन जन में प्रचलित हों, घर घर में गाये जाऍं यही मेरी कामना है।
रीवा डा. भगवती प्रसाद शुक्
05/06/1982 आचार्य एवं अध्यक्ष हिंदी विभाग
अवधेश प्रताप सिंह विश्व. रीवा मध्यप्रदेश

बघेली कविता संग्रह 'गाँव गोहार' की समीक्षा

  गाँँव गोहार : एक सापेक्ष आकलन                                               - गीतकार सुमेर सिंह शैलेश   बघेली के लोकप्रिय कवि सूर्यभान कुश...