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बुधवार, 27 मई 2026

बघेली काव्‍य कृति: दिया बरी भा अंजोर का संक्षिप्‍त विवेचन

    

बघेली की प्रथम प्रकाशित काव्‍य कृति: दिया बरी भा अंजोर 

                                                             - प्रियांशु प्रिय 

बघेली कवि सैफुद्दीन सिद्दीकी 'सैफूू
                                         

भारत विविधताओं का देश है। यहाँ की मिट्टी ने न केवल अनेक धर्म, जातियाँ और संस्कृत‍ियों को जन्‍म दिया है अपितु सैकड़ों बोलियाँ और भाषाएँ भी अपनत्‍व को दर्शाती रही हैं। यही भाषाई विविधता भारत की सबसे बड़ी सांस्‍कृतिक शक्‍त‍ि है जो उसे विश्‍व के अन्य देशों से अलग करती हैं। हिंदी, तमिल, बंगला, मराठी जैसी प्रमुख भाषाओं के साथ-साथ भारत के हर क्षेत्र में लोक जीवन से जुड़ी लोकभाषाएँ भी हैं। जो अपने भीतर उक्‍त भूमि की आत्‍मा और जनता की संवेदना को समेटे हुए हैं।

इन्‍हीं लोकभाषाओं में एक हैं बघेली। जो पूर्वी हिंदी के अंतर्गत आने वाली तीन बोलियों या उपभाषाओं (अवधी,बघेली,छत्‍तीसगढ़ी) में से एक है। बघेली केवल एक लोकभाषा नहीं बल्‍कि एक जीवंत संस्‍कृति का प्रतीक है। इसमें लोकगीत, लोककथाएँ, लोकनाट्य, मुहावरे, क‍हानियाँ आदि समाहित हैं। जो इसकी संस्‍कृति का परिचय देती हैं।

बघेली साहित्‍य में अनेक कवियों ने अपने शब्‍दों से लोकभावनाओं को स्‍वर दिया है। इसी कड़ी में प्रमुख नाम है कवि सैफुद्दीन सिद्दीकी सैफू। सैफू जी ने अपनी रचनाओं से न केवल बघेली की लोकधारा को साहित्‍यि‍क रूप प्रदान किया बल्‍कि‍ उसमें साम‍ाजिक चेतना, मानवता और समरसता के भावों को भी गहराई से अभिव्‍यक्त किया। सैफू पर बात करना इसलिए भी बेहद ज़रूरी है क्योंकि ये बघेली के उन चुनिंदा कवियों में हैं जिन्‍होंने बघेली के साहित्‍य में नींव का काम किया है। बघेली साहित्‍य की बात हो और बैजू, सैफू,शंभू, रामदास पयासी का नाम न लिया जाए यह बात संभव नहीं प्रतीत होती। इस लेख को लिखने का एक उद्देश्‍य यह भी है कि जिस कवि ने अपने रचनात्‍मक साहित्‍य में विभिन्‍न विधाओं की ओर अपनी सशक्‍त लेखनी चलाई उसके बावजूद इन्‍हें सिर्फ किताब के पन्‍नों तक ही सीम‍ित रखा गया है। बघेली के अनेक कार्यक्रम होते हैं पर शायद ही सैफू उन कार्यक्रमों में याद किए जाते हों। आश्‍चर्य है कि जो कवि साहित्‍य की विभिन्‍न विधाओं – प्रबंध काव्‍य, कहानी, कविता आदि – में अपनी पैनी दृष्टि रखता हो और जिसकी बघेली की पहली काव्‍य कृति सर्जनात्मक धरातल पर लिखा गया पहला काव्‍य संग्रह हो न सिर्फ प्रकाशन की दृष्‍टि से बल्कि रचनाओं की मारक क्षमता की दृष्टि से भी। उसको इस तरह हाशिए में रख देना, गहरे सवाल पैदा करता है। अ.प्र.सि.वि.वि. पूर्व ह‍िन्‍दी विभागाध्‍यक्ष डॉ भगवती प्रसाद शुक्‍ल कहते है कि सैफू के पूर्व भी बघेलखंड में साहित्‍य रचा गया है किंतु उसे बघेली का शुद्ध मूल साहित्‍य नहीं कहा जा सकता। शुद्ध बघेली को साहित्‍यि‍क विधा के हर क्षेत्र में सैफू ने ही भरा है। सैफू की यही विशेषता है।  बघेली साहित्‍य के इन वट वृक्षों को किसी पाठ्यक्रम में शामिल भर कर लेने से उनकी प्रासंगिकता नहीं तय होती है। हमें उनकी रचनाओं को आज की नई पीढ़ी तक भी पहुंचाना होगा। समाज के उस अंति‍म व्‍यक्‍ति तक भी इन कवियों की रचनाओं की गूंज जानी चाहिए जिनके लिए यह साहित्‍य रचा गया है। समस्‍या ये है कि‍ नया रचनाकार सैफू को पढ़ता या जानता नहीं है और जो सैफू के समय के साहित्‍यकार हैं उन्‍हें अपने रचे हुए साहित्‍य की प्रशंसा और वाहवाही से फुर्सत नहीं है। मेरे पास सैफू की कुछ कृतियां रखी हुई हैं। मैंने जब जैसा समय मिला उनका अध्‍ययन किया है। कुछ जानकारी अपने पिताजी से इकट्ठा की है और कुछ वि‍भिन्‍न विद्वानों के लेखादि से। जिन्‍हें मैं संदर्भ में प्रस्‍तुत करूंगा। मैं न बघेली साहित्‍य का ज्ञाता हूं न ही इस विषय पर इतना गहन अध्‍ययन है। ले‍किन बैठे-ठाले ही सही जब सैफू की रचनाएं पढ़ता हूं तो हर बार मेरी भी कुछ कहने की इच्‍छा होती है। इसी कहन का परिणाम यह लेख है। कवि सैफू के कृतित्व पर यह छोटा से लेख लिखकर कोई पहाड़ तो नहीं तोड़ दूंगा। लेकिन मेरे भीतर सैफू के रचनाओं के बारे में कुछ लि‍खने की जो तड़प थी उसे अवश्‍य शांति मिलेगी। बहरहाल, आज हम सैफू की प्रथम प्रकाशित काव्‍य कृति 'दिया बरी भा अंजोर' की संक्षेप में चर्चा करेंगे। 

सैफू का जीवन परिचय

कवि सैफुद्दीन सिद्दीकी सैफू का जन्‍म सतना जिले के अमरपाटन तहसील अंतर्गत ग्राम रामनगर में 1 जुलाई सन् 1932 को हुआ। बाणसागर योजना के कारण ग्राम रामनगर का कुछ क्षेत्र अधिक प्रभावित हुआ इसी कारणवश सन् 1983 में शासन द्वारा मुआवजा प्राप्‍त कर सैफू ने अपना निवास स्‍थान सतना शहर में सिविल लाइन के पास गढ़‍िया टोला, बगहा में बना लिया। इनके पुत्र जमीलुद्दीन सिदृीकी - जो स्‍वयं भी कवि हैं - आज भी वहाँ निवास कर रहे हैं। सैफू को साहित्‍य के प्रति लगाव विरासत में मिला। आपके पिता मुंशी नजीरूद्दीन सिद्दीकी उपमाहिंदी, उर्दू और बघेली के एक प्रतिभा संपन्‍न कवि थे। जीविकोपार्जन के‍ लिए सैफू राजस्‍व निरीक्षक के पद पर कार्यरत रहे एवं सेवानिवृत्‍त‍ि के उपरांत कुछ समय तक आयुर्वेद चिकित्‍सा विशारद की परीक्षा पास करके एक सफल वैद्य के रूप में जनता की सेवा करते रहे लेकिन समयाभाव के कारण वे वैद्यक से दूर होकर लोक साहित्‍य के अध्‍ययन और रचनात्‍मक लेखन में ही संलग्‍न रहे और अपनी मातृभाषा के प्रति गहरा लगाव होने के कारण उन्‍होंने हिंदी साहित्‍य रत्‍नकी परीक्षा भी उत्‍तीर्ण की। कवि सैफू की रचनाएँ उन दिनों की लोकप्रि‍य पत्र‍िकाओं और समाचार पत्रों - प्रकाश,भास्‍कर, बान्‍धवीय, दैनिक जागरण, मित्र दीपि‍का, आर्थिक घोष तथा प्राणलोक आदि - में प्र‍काशित होती रहीं। इसके साथ साथ आकाशवाणी रीवा से भी सैफू की कुण्‍डलियाँ, बघेली कविताएँ, बघेली गीत, कहानियाँ आदि प्रसारित होती रही हैं। सैफू की रचनाएँ बांधवीय महाराज श्री गुलाब सिंह जू देव रीवा नरेश द्वारा पुरस्‍कृ‍त हैं। सेवानिवृत्‍त‍ि के थोड़े समय बाद ही मधुमेह की लंबी बीमारी के चलते सन् 1987 को रीवा अस्‍पताल में सैफू का निधन हो गया।

सैफू की प्रकाशित कृतियाँ –

1. एक दिन अइसव होई – कुण्‍डलियां संग्रह (1980)

2. सैफू के बघेली गीत – गीत संग्रह (1982)

3. नेउतहरी – बघेली कहानी संग्रह (1981)

4. भारत केर माटी – बघेली भाषा काव्य (1981)

5. इन्दल दिल्लू – प्रबंध काव्य (1982)

6. दिया बरी भा अंजोर – बघेली कविता संग्रह (1978)

7. सैफू की पहेलियाँ -

सैफू की अप्रकाशित कृतियाँ -

1. चुनाव के चक्‍कर (बघेली हास्‍य एवं व्‍यंग्‍यपूर्ण कविताएं)

2. चिटका के राख ( बघेली में एक सती की कहानी )

3. बलम बेसर गढ़बावा ( बघेली गीत: रचना )

4. रमजानी का हुक्‍का ( बघेली उपन्‍यास )

5. महतौ घुसे पयार मा (बघेली व्‍यंगात्‍मक कुंडलियाँ)

6. भजनावली (खड़ी बोली कविताएँ)

7. शहादत इमाम हसन हुसेन ( बघेली रचनाएँ )

काव्‍य कृति : दिया बरी भा अंजोर          

रचनाकार क्षेत्रीय बोली का हो या एक व्‍यापक क्षेत्र में फैली हुई भाषा का। उसका पहला काव्‍य सृजन भोगा हुआ यथार्थ ही होता है। 70-80 के दशक में हमारे बघेलखंड के ग्रामीण क्षेत्र इतने समृद्ध न‍हीं थे कि वहाँ का किसान, मजदूर, महिलाएँ शासन की तमाम सुख-सुविधाएँ प्राप्‍त कर सकें और प्रसन्‍नता पूर्वक जीवन व्‍यतीत हो सके। किसान खेती करने के बाद भी परेशान, युवा वर्ग में शिक्षा का अभाव, अगर पढ़ लिख भी गए तो नौकरी मिलने की संभावना इतनी अधिक नहीं होती थी। जातिगत भेदभाव का तो कहना ही क्‍या। गांव का मजदूर व किसान किसी के भरोसे न रहकर अपनी मेहनत के बलबूते माटी के बने हुए उन्‍हीं दो-एक कमरों में सारी गृहस्‍थी रखता, बेटे-बेटियों का विवाह करता और अपना सारा जीवन काट देता। इन्‍हीं सब बातों के संग्रह को काव्‍यात्‍मक रूप देने का नाम है दिया बरी भा अंजोर। इस काव्‍य संग्रह का प्र‍काशन सन् 1978 में हुआ। इस पुस्‍तक के लिए साहित्‍य परिषद भोपाल द्वारा सैफू जी को 1500 रूपए एवं दुष्‍यंत कुमार पुरस्‍कार प्रदान कर सम्‍मानित भी किया गया। ध्‍यातव्‍य हो कि दिया बरी भा अंजोरसर्जनात्‍मक धरातल पर लिखा गया बघेली का प्रथम काव्‍य संग्रह भी है। 54 कविताओं के इस संग्रह में सैफू जी ने अपने समय का पूरा ग्रामीण चित्र प्रस्‍तुत कर दिया है। गोस्‍वामी तुलसीदास रामचरितमानस जैसा विश्‍वप्रसिद्ध महाकाव्‍य‍ लिखकर बड़ी विनम्रता से यह स्‍वीकार कर कहते हैं कि उनमें कविता रचने की तनिक भी समझ नहीं है -  

            कवित्‍त विवेक एक नहीं मोरे, सत्‍य कहउं लिखि कागद कोरे

कवि सैफू भी इसी भांति अपनी रचनाओं को तुकबंदी मात्र कहकर काव्‍य कृति पाठकों को समर्पित करते हैं –
                         पइसा कउड़ी नहीं पास मा
, जउन राज का देई।
                       तुक बन्‍दी लिख धरेन बहुत लग
, या अपनै लइ लेई।

इस कृति की पहली कविता है लीला तोर अपार। सैफू ने उस परमात्‍मा को प्रणाम और उसकी लीला को अपरंपार कहकर अपनी कविता की शुरूआत की है जो इस सकल विश्‍व का संचालन करता है वो ईश्‍वर भी है, अल्‍लाह भी है जो चींटी से लेकर हाथी तक भोजन उपलब्‍ध कराता है और धरती से लेकर आकाश तक तमाम सुख-दुख का साथी है। सैफू लिखते हैं –

                      तैं महतारी बाप तहिन तैं हितुआ नात बिरादर।
                      तैं लड़िका तैं नाती पंती तहिन बिराजे घर घर।।
                      धरती औ आकास सबत्‍तर
, भरम जाल है तोरै।
                      सुरिज जोंधइया घाम बइहरा
, गुन बक्‍खानै थोरै।।
                      चिहुंटी से हाथी तक का तैं रोज खांय का देते।
                      सबके सुख-दुख खोज खबर तैं चौबीस घंटा लेते।

बिना किसी का नाम लिए, बिना कोई धर्म आदि का उल्‍लेख्‍य किए सृष्टि के रचयिता और मनुष्‍य से लेकर जानवर और कीड़े-मकोड़ों तक सबकी ओर अपनी दृष्टि रखने वाले उस मालिक का एतने अद्भुत शब्‍द कौशल के साथ बखान सिर्फ सैफू जैसा कवि ही कर सकता है। सैफू बघेली लोक संस्‍कृति की एक-एक गली देख आएं हैं। न सिर्फ देख आएं है बल्कि वहाँ की प्रत्‍येक खुशबू को अपने रचनात्‍मक कोश में समेट लिया है। उनकी रचनाओं में बघेलखंड की संस्‍कृति का शायद ही कोई क्षेत्र छूटा हो। अवधेश प्रताप सिंह विश्‍वविद्यालय रीवा में हिंदी विभागाध्‍यक्ष रहे डॉ भगवती प्रसाद शुक्‍ल लिखते हैं –

श्री सैफू बघेली के अप्रतिम कवि हैं। जब भी उन्‍हें देखता हूं तो लगता है जगह जगह फैली हुई बघेलखंड की धरती और उसकी परंपरागत अनगढ़ मूर्तिया साकार हो उठती हैं। वहाँ बघेलखंड की चोटियाँ अपनी समग्र ऊँचाई में उनके साथ एकाकार हो गई हैं। 

प्रस्‍तुत काव्‍य संग्रह दिया बरी भा अंजोरबघेली साहित्‍य का महत्चपूर्ण दस्‍तावेज है। इसमें बघेलखंड की माटी की महक है। इस अंचल की व्‍यथा कथा इसमें गूंथी हुई है। दीपावली के ज्‍योति पर्व को अर्पित एक विवश यथार्थ द‍ेखिए –

                    मनई हरबाहन का, गोरूआ चरबाहन का,
                    बढ़ई अऊ लोहरा का
, धोबी औ डोहरा का,
                     छीपी कुम्‍हारन का
, सोनरा   डोमारन   का,
                     माटी डरबइयन का
, खपड़ा परबइयन का,
                     साल भर होइगा
, न दीन्‍ह‍िंन मजूरी।
                     दिया बरी भा अंजोर
, दूरिन दूरी।

दिया बरी भा अंजोर की अनेक रचनाएँ आज के समय भी उसी तरह प्रासंगिक बनी हुई हैं। सारा देश बढ़ती महंगाई से परेशान है। गरीब और मध्‍यम वर्ग की कमाई उतनी ही है लेकिन खर्चा दिन-प्रतिद‍िन बढ़ रहा है। ऐसी भीषण महंगाई में बड़ी मुश्‍किल से वह घर चलाता है और अपने बीवी बच्‍चे पालता है। आज तकनीक इतना आगे बढ़ गई है और पहले की अपेक्षा शिक्षा भी लगभग व्‍यक्‍ति पा रहा है परंतु गरीबी और महंगाई जस की तस है या यों कहें कि पहले से भी अधिक। मध्‍यमवर्गीय परिवार का यह दृश्‍य देखिए जब घर में कमाने वाला एक ही आदमी हो और ज़रूरतें अधिक –

                      लड़‍िका कउनौ पोथी मांगै, कउनव सिलेट का रोबत है।
                      कउनव पइजामा का अरझा
, कउनव बिन खाए सोबत है।
                     घर मा कमवइया एकै जन
, मुसलेहड़ी अस गोरुआरी है ।
                     जो बचै कुछु तो  जोर  धरी  घरहिन  के  खरचा भारी  है।
                                                          को कहै बड़ी महंगाई है........

सैफू की रचनाएँ किसान के लड़के को पढ़ने पर खूब जोर देते हैं लेकिन देश में बेरोजगारी और दूसरी ओर घूंसखोरी आदि देखकर उनका एक मन उसको किसानी में ही लगे रहने को कहता है। ... /दे रकेय खूँटी मा टोपा/ दइले टुट‍ही खोम्‍हरी/ डेला फोर खेत के साम्‍हू/लइके एकठे मोगरी/.. सैफू ने इस कृति में कई रचनाएँ युवाओं के लिए लिखी हैं। वो गलत संगत में बिगड़ा हुआ युवा भी है, गरीबी में पढ़ाई न कर पा रहा लड़का भी है और इन सबसे परे जो गरीब किसान के साथ खेत में काम करने जा रहा है, वह भी है। यहाँ उन कविताओं का शीर्षक उल्‍लेख कर देना आवश्‍यक है – पढ़इयन से, दइजहा लड़‍िका, कुलच्‍छन लड़‍िका, खेती औ पढ़ाई  आदि।

सैफू की कविताओं में हास्‍य और व्‍यंग्‍य का भी बहुत सुंदर और बारीकी से चित्रण है। अक्‍सर कव‍ि सम्‍मेलनों में वे अपनी हास्‍य कव‍िताओं से अपने श्रोताओं को लोटपोट कर देते थे। हास्‍य और व्‍यंग्‍य को एक मथानी में फेंटकर सैफू ने बड़े मनोहर चित्र अपनी रचनाओं में खींचे हैं। इनका प्रयोग भी उन्‍होंने बड़ी सावधानी के साथ किया है। अनेक हास्‍य कविताऍं इस कृति में संकलित हैं – अपढ़ मेहेरिया, फूहर मेहेरिया, लड़कई केर बियाह, दुइठे मेहरारू,सपने के नेउतहरी,नाउ के उल्‍टा गुन  आदि।     

सैफू कई त्‍योहारों की भी चर्चा अपनी इस कृति में करते हैं। दीपावली, होली, बसंत पंचमी आदि। लेकिन इन त्‍योहार के बीच भी सैफू गरीब की वेदना को खोज पाने में पूरी तरह सफल हुए हैं। सबको इन त्‍योहारों का बड़ा बेसब्री से इंतज़ार है लेकिन गांव का वह गरीब किसान और मजदूर जिसको सुबह मेहनत के बाद शाम की रोटी की चिंता रहती है, उसके लिए भला किसी त्‍योहार आदि का कैसा उत्‍साह ? गरीब केर देबारी कविता का एक मार्मिक चित्र देखिए –

                             मन के बात मनै मा रह‍िगै, होइगै आज देबारी।
                             बातिउ भर का तेल न घरमा
, दिया कहाँ ते बारी।
                             कउन लक्ष्‍मी धरी लाग ही
, जेखर करी पुजाई ।
                             कउने फुटहा घर मा ओखर
, मूरत हम बइठाई।
                             नरिअर रोट बतासौ चाही
, कमरा दरी बिछाई।
                             है तो हियां फटहिबै कथरी
, छूंछ खलीसा भाई।।

लेकिन सैफू वो कवि नहीं हैं जो गरीब केर देबारीलिखकर और उस दृश्‍य का मार्मिक वर्णन मात्र करके किनारे हो जाए। उन्‍होंने उसकी परिस्‍थ‍ि‍ति‍ को समझा है और ढाढ़स भी बांधा है। उन्‍हें उसकी मेहनत पर पूरा भरोसा है और पूरी उम्‍मीद भी है कि एक दिन उसके घर में दीपावली का दिया जगमगाएगा और खुशी के दिन लौटेंगे -   

           ढुकुर ढुकुर आँसू, न बहाव महतारी
           फिरी तोर बेरा
, अई पुन‍ि के देबारी....
 

डॉ भगवती प्रसाद शुक्‍ल लिखते हैं – सैफू की कविताओं में विषय वैविध्‍य है। ग्रामीण जीवन की छोटी इकाई से लेकर अंतर्राष्‍ट्रीय जगत की ईकाई तक उनकी दृष्‍ट‍ि गई है। करूण रस में डूबने वाली व्‍यंग्‍य प्रधान लेखनी में हर्षोल्‍लास की झलक यत्र-तत्र देखने को मिलती है, उसी प्रकार जिस प्रकार मंहगाई से प्रताड़‍ित गरीब किसान-मजदूर भी तिथि‍ त्‍यौहार, शादी-ब्‍याह में प्रसन्‍न हो लेता है। चाही उसकी प्रसन्‍नता क्षणिक ही हो।

हिंदी साहित्य में अतुकांत कविता की शुरुआत महाप्राण निराला करते हैं। उसके बाद नई कविता का दौर आता है 70-80 का दशक आते आते अतुकांत कविताओं की धूम हो जाती है। इस ओर सैफू ने भी अपनी कलम चलाई और अतुकांत कविता में छुटपुट बघेली व्‍यंग्‍य भी लि‍खे –

          ......नेता गाँधी टोपी/मैगल हाथी/लम्‍मा कुरथा/कूकुर भोंकै/भरा भरा मइदान/मनई जुहान/मांगै कुछ/न पइसा/न कउड़ी/न नोट/बलुक बोट/.....

दिया बरी भा अंजोर सैफू की यथार्थवादी कविताओं का संकलन है। गाँवों में मिट्टी के टूटे-फूटे घरों का दृश्‍य  प्रस्‍तुत करती गमइन के घरऔर उसी गाँव का एक खूबसूरत चित्र दिखाती कविता हमार गाँव’, रिश्‍वतखोरी पर व्‍यंग्‍य करती जै घूंस राम, जै जै अँकोर। इतिहास की ओर निहारकर लिखी गई रचनाओं में चरकागढ़ की राजकुमारी रूपमतीके साथ साथ लोकनायक जय प्रकाश नारायण की प्रशंसा में लिखि‍त कविता बाबू जय परकाश नरायन जैसी कविताएं सैफू की सामाजिक, ऐतिहासिक और राजनैतिक दृष्टि का द्योतक हैं।
प्रो सेवाराम त्रिपाठी के शब्‍दों में – सैफू का सबसे बड़ा अवदान यही है उन्‍होंने काव्‍य में यथार्थ की सार्थक प्रतिष्‍ठा की और बघेली के विकास में अपने को समर्पित किया। सैफू मूलत: किसान संवेदना को अपनी कविता में उजागर करते हैं। उनकी कविता मज़दूरों और छोटे लागों की स्‍थि‍त‍ियों
, समस्‍याओं को घेरती है। उनमें उपदेशात्‍मकता भी बार बार दिखाई पड़ती है। फिर भी उनकी कविता ने बघेली जनजीवन के अपने अमिट पद चिह्न छोड़े हैं। 

बघेली काव्‍य कृति: दिया बरी भा अंजोर का संक्षिप्‍त विवेचन

     बघेली की प्रथम प्रकाशित काव्‍य कृति: दिया बरी भा अंजोर                                                                 - प्रियांशु प्रि...